
श्री हनुमान चालीसा
Dedicated to भगवान हनुमान • हिन्दी (Hindi)
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श्री हनुमान चालीसा क्या है? (Hanuman Chalisa in Hindi)
श्री हनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा अवधी भाषा में रचित एक अत्यंत पावन और चमत्कारी स्तुति है। इसमें कुल 40 चौपाइयां और 3 दोहे (2 आरंभिक और 1 समापन) हैं। चालीसा का अर्थ 40 होता है, जो प्रभु श्री राम के परम भक्त और भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार श्री हनुमान जी के असीम बल, बुद्धि, विद्या और भक्ति का गुणगान करता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करने से भय, संकट, नकारात्मक ऊर्जा और समस्त रोगों का नाश होता है।
हनुमान चालीसा पाठ विधि एवं नियम (How to Read)
- शुभ दिन: मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।
- उत्तम समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या सांध्य काल में स्नान के पश्चात लाल या पीले वस्त्र धारण कर पाठ करें।
- पूजा सामग्री: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठें, चमेली के तेल या शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
- पाठ संख्या: प्रतिदिन कम से कम 1, 3, 7, 11 अथवा 100 बार पाठ करने का विधान है।
॥ दोहा ॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
भावार्थ: अपने गुरु के चरण-कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके, मैं श्री रघुवीर के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों फलों को देने वाला है।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौ पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
भावार्थ: हे पवनपुत्र! मैं स्वयं को बुद्धिहीन जानकर आपका स्मरण करता हूँ। आप मुझे बल, बुद्धि और विद्या प्रदान करें तथा मेरे समस्त क्लेशों और विकारों का हरण करें।
॥ चौपाई ॥
१. जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
भावार्थ: ज्ञान और गुणों के अथाह सागर श्री हनुमान जी की जय हो! तीनों लोकों में अपने पराक्रम को प्रकाशित करने वाले वानरराज कपीश्वर की जय हो!
२. राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
भावार्थ: आप श्री राम के परम दूत और अतुलनीय बल के धाम हैं। आप माता अंजनी के पुत्र और पवनसुत के नाम से विख्यात हैं।
३. महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
भावार्थ: हे महावीर, वज्र के समान दृढ़ अंगों वाले बजरंगबली! आप दुर्बुद्धि का नाश करने वाले और सुबुद्धि (सद्बुद्धि) के परम साथी हैं।
४. कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥
भावार्थ: आपका स्वरूप स्वर्ण के समान कांतिमान और सुंदर वेशभूषा से सुशोभित है। आपके कानों में दिव्य कुंडल और केश सुंदर घुंघराले हैं।
५. हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
भावार्थ: आपके एक हाथ में वज्र और दूसरे हाथ में ध्वजा शोभायमान है। आपके कंधे पर पवित्र मूंज का जनेऊ सुशोभित है।
६. संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥
भावार्थ: हे भगवान शिव के रुद्रावतार और केसरीनंदन! आपके अपार तेज और शौर्य की संपूर्ण जगत वंदना करता है।
७. बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
भावार्थ: आप समस्त विद्याओं में पारंगत, परम गुणवान और अत्यंत चतुर हैं। आप सदा प्रभु श्री राम के कार्यों को पूर्ण करने के लिए तत्पर रहते हैं।
८. प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
भावार्थ: आप प्रभु श्री राम के चरित्र और कथा को सुनने के रसिक हैं। आपके हृदय में सदा श्री राम, लक्ष्मण जी और माता जानकी निवास करते हैं।
९. सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भावार्थ: आपने माता सीता के सम्मुख अति सूक्ष्म रूप धारण कर दर्शन दिया, और वहीं विकराल रूप धारण कर लंका नगरी को भस्म कर दिया।
१०. भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज संवारे॥
भावार्थ: आपने विशालकाय भीम रूप धारण करके राक्षसों का संहार किया और प्रभु श्री रामचंद्र जी के सभी कार्यों को संवारा।
११. लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
भावार्थ: आपने द्रोणागिरि पर्वत से संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा की, जिससे प्रसन्न होकर श्री राम ने आपको हृदय से लगा लिया।
१२. रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
भावार्थ: श्री रघुनाथ जी ने आपकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा कि तुम मुझे भरत के समान ही प्रिय भाई हो।
१३. सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
भावार्थ: सहस्र मुख वाले शेषनाग भी तुम्हारे यश का गान करते हैं, ऐसा कहकर लक्ष्मीपति श्री राम ने आपको पुनः कंठ से लगा लिया।
१४. सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥
१५. जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
भावार्थ: सनक आदि ऋषि, ब्रह्मा जी आदि देवता, नारद जी, सरस्वती जी और शेषनाग तथा यमराज, कुबेर और समस्त दिक्पाल भी आपके पूर्ण यश का वर्णन करने में असमर्थ हैं; फिर साधारण कवि आपकी महिमा कहाँ तक कह सकते हैं!
१६. तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
भावार्थ: आपने सुग्रीव पर महान उपकार किया, उन्हें श्री राम से मिलाकर किष्किंधा का राजपद पुनः दिलाया।
१७. तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
भावार्थ: विभीषण ने आपके परामर्श और उपदेश को स्वीकार किया, जिसके फलस्वरूप वे लंका के राजा बने, जिसे सारा संसार जानता है।
१८. जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
भावार्थ: जो सूर्य सहस्रों योजन की दूरी पर स्थित है, उसे आपने बाल्यकाल में एक मीठा फल समझकर निगल लिया था।
१९. प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
भावार्थ: आपने प्रभु श्री राम की मुद्रिका को मुख में रखकर विशाल समुद्र को एक छलांग में पार कर लिया, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।
२०. दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
भावार्थ: इस संसार में जितने भी कठिन से कठिन कार्य हैं, वे सब आपकी कृपा दृष्टि से अत्यंत सहज और सुगम हो जाते हैं।
२१. राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
भावार्थ: आप श्री राम के दरबार के द्वारपाल हैं। आपकी आज्ञा के बिना कोई भी उनके समीप प्रवेश नहीं कर सकता।
२२. सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना॥
भावार्थ: जो भी आपकी शरण में आता है, वह समस्त सुखों को प्राप्त करता है। जब आप रक्षक हैं, तो किसी भी प्रकार का भय नहीं रह जाता।
२३. आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भावार्थ: आपके अतुलनीय तेज और वेग को केवल आप ही संभाल सकते हैं। आपकी एक गर्जना से तीनों लोक भयभीत होकर कांप उठते हैं।
२४. भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥
भावार्थ: जहाँ भी महावीर हनुमान जी का नाम लिया जाता है, वहाँ भूत-पिशाच और कोई भी नकारात्मक शक्ति निकट नहीं आ सकती।
२५. नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
भावार्थ: वीर हनुमान जी का निरंतर नाम जपने और स्मरण करने से समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं और सारी पीड़ाएं दूर हो जाती हैं।
२६. संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
भावार्थ: जो मनुष्य मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, हनुमान जी उसे जीवन के प्रत्येक संकट से मुक्त कर देते हैं।
२७. सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
भावार्थ: तपस्वी राजा प्रभु श्री रामचंद्र जी सर्वश्रेष्ठ हैं, और आपने उनके समस्त कार्यों को सफलतापूर्वक संवारा है।
२८. और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥
भावार्थ: आपके दरबार में जो कोई भी अपनी मनोकामना लेकर आता है, वह ऐसा अक्षय फल प्राप्त करता है जिसकी कोई सीमा नहीं।
२९. चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
भावार्थ: आपका प्रताप चारों युगों (सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग) में विद्यमान है, और आपकी पावन कीर्ति संपूर्ण जगत में प्रकाशमान है।
३०. साधु-संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
भावार्थ: आप साधु-संतों और सज्जनों के रक्षक हैं, राक्षसों का संहार करने वाले हैं और प्रभु श्री राम के अति प्रिय हैं।
३१. अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता॥
भावार्थ: आपको पूज्या माता जानकी ने वरदान दिया है कि आप भक्तों को आठों सिद्धियाँ और नवों निधियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं।
३२. राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥
भावार्थ: आपके पास प्रभु श्री राम के नाम रूपी अमृत का रसायन है, और आप सदैव श्री रघुनाथ जी के परम सेवक हैं।
३३. तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम-जनम के दुख बिसरावै॥
भावार्थ: आपका भजन करने से प्रभु श्री राम की प्राप्ति होती है और जन्म-जन्मांतर के संताप व दुख समाप्त हो जाते हैं।
३४. अंतकाल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
भावार्थ: अंत समय में ऐसा भक्त श्री राम के परम धाम को जाता है, और यदि इस लोक में पुनः जन्म ले तो हरि-भक्त के रूप में विख्यात होता है।
३५. और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
भावार्थ: किसी अन्य देवी-देवता का ध्यान न भी किया जाए, केवल हनुमान जी की सेवा और स्मरण से ही जीवन के सभी सुख प्राप्त हो जाते हैं।
३६. संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
भावार्थ: जो भी महाबली वीर हनुमान जी का स्मरण करता है, उसके सारे संकट कट जाते हैं और सभी कष्ट मिट जाते हैं।
३७. जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
भावार्थ: हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप सद्गुरु देव की भांति मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें।
३८. जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥
भावार्थ: जो कोई भी इस पावन चालीसा का सौ बार पाठ करता है, वह जन्म-मरण के सारे बंधनों से मुक्त होकर परम सुख को प्राप्त करता है।
३९. जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
भावार्थ: जो भी इस हनुमान चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, उसे समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं—इसके साक्षी स्वयं देवाधिदेव भगवान शिव हैं।
४०. तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥
भावार्थ: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि हे प्रभु! मैं सदा श्री हरि का दास हूँ। हे नाथ, आप सदा के लिए मेरे हृदय में वास कीजिए।
॥ दोहा ॥
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
भावार्थ: हे पवनसुत! संकटों को हरने वाले और साक्षात् मंगल की मूर्ति! आप प्रभु श्री राम, लक्ष्मण जी और माता सीता सहित मेरे हृदय में सदा के लिए निवास कीजिए।
हनुमान जी की प्रमुख स्तुतियां एवं साधना (Hanuman Aarti & Mantra)
हनुमान चालीसा के पाठ के उपरांत विधिवत पूजा संपन्न करने हेतु निम्न स्तुतियों का पाठ अवश्य करें:
- श्री हनुमान आरती (आरती कीजै हनुमान लला की): पूजा के अंत में आरती करने से पूजा में हुई त्रुटियों की क्षमा होती है और प्रभु की विशेष कृपा मिलती है।
- हनुमान मूल मंत्र (ॐ हनुमते नमः): संकटों के त्वरित निवारण और आत्मबल वृद्धि हेतु हनुमान मंत्र का 108 बार जप करें।
- श्री बजरंग बाण: अतीव संकट एवं भय निवारक अचूक स्तोत्र।
- हनुमान बाहुक: असाध्य शारीरिक कष्टों एवं रोगों से मुक्ति हेतु गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित स्तोत्र।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ - श्री हनुमान चालीसा)
१. हनुमान चालीसा की रचना किसने और किस भाषा में की?
हनुमान चालीसा की रचना 16वीं शताब्दी में महान कवि-संत गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा अवधी भाषा में की गई थी।
२. हनुमान चालीसा में कुल कितने छंद हैं?
हनुमान चालीसा में कुल ४३ छंद हैं—२ आरंभिक दोहे, ४० चौपाइयां और १ समापन दोहा।
३. हनुमान चालीसा का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
साधक अपनी सुविधा अनुसार प्रतिदिन १, ३, ७ अथवा ११ बार पाठ कर सकते हैं। चौपाई ३८ के अनुसार, जो व्यक्ति इसका १०० बार पाठ करता है, वह समस्त सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर परम सुख को प्राप्त करता है।
४. क्या हनुमान चालीसा अंग्रेजी व अन्य भाषाओं में उपलब्ध है?
हाँ, चालीसा घर पर आप हनुमान चालीसा को अंग्रेजी अनुवाद व रोमन लिरिक्स तथा बांग्ला अनुवाद में भी ऑडियो एवं फ्री प्रिंटेबल PDF के साथ पढ़ सकते हैं।
